डॉ.बाबासाहब के महापरिनिर्वाण के बाद लंबे समय तक SC, ST एवँ पिछड़ो के अधिकारों को लडनेवाले नेताओं का अकाल पड़ गया था। उस समय डॉ. बाबासाहब के आंदोलन को दफन करने की साजिश की जा रही थी, तब भारत की राजनीति के इतिहास में बहुजन समाज के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उत्थान के लिए बाबासाहब के बाद उनके कारवाँ आगे ले जानेवाले दूसरे मसीहा मान्यवर कांशीरामजी ने बहुजन समाज के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।
डॉ.बाबासाहब के राजनैतिक प्रजातंत्र और राष्ट्र निर्माण के आंदोलन का कोई कांशीराम से बड़ा उत्तराधिकारी हो ही नहीं सकता..!!!
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| (मा.कांशीरामजी के साथ अहमदाबाद से प्रकाशभाई बैंकर साहब) |
हमारे बुजुर्गों के संघर्ष के कारण बदलाव आया है लेकिन बाबासाहब के जाने के बाद बदलाव रुका था। संघर्ष रूका और संघर्ष न होने के कारण बदलाव रूका । अगर हमें उस बदलाव को मंजिल तक पहुँचाना है तो ये बहुत जरूरी है कि हम सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी का अंत करे। डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर ने संविधान में जो कमी थी वो ऐसेम्बली के सामने रखी। उन्होंने संविधान सभा में कहा कि २६ जनवरी १९५० के दिन हम विरोधाभास की जिन्दगी में कदम रखने जा रहे हैं। राजनीति में बराबरी होगी, एक आदमी का एक वोट होगा... एक वोट की एक किंमत होगी लेकिन सामाजिक और आर्थिक दृश्य में वो गैर बराबरी जो हजारों सालों से रूढ़िवादी सामाजिक व्यवस्था के आधार पर चल रही है वो उसी तरह से चलती रहेगी। इस गैर बराबरी के चलते हुए सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी की वजह से हम लोग राजनीति में आगे बढ़ नहीं पायेंगे..
"सत्ता ही सभी तालों की चाबी हैं" - डॉ.बाबासाहब अम्बेडकर के इस विधान पर भरोसा रखकर प्रजातंत्र में जो हक दिए उसके आधार पर आंदोलन हो सकता हैं, एैसी सोच के बाद उन्होंने नारे दिये कि,
वोट से लेगें PM,CM
आरक्षण से लेगें SP,DM
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| मा. कांशीरामजी के साथ कु. मायावती |
उतरप्रदेश में कु.मायावतीजी की सरकार बनाकर उन्होंने इस नारे को सच साबित कर दिया था। राजसत्ता प्राप्त कर के और उसके जरिए समाज परिवर्तन करना ये उनकी एक राजनैतिक धारा थी। उन्होंने अपनी विरासत खुद खड़ी की।
पत्रकार ने साक्षात्कार के वक्त एक सवाल पूछा कि, अगर दिल्ली की खुरशी किसी दल के सहयोग से मिले तो आप राष्ट्रपति पद लेंगे..??
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| मा.कांशीरामजी के साथ पूर्व प्रधानमंत्री |
तब कांशीरामजी ने कहा कि, मेरे पास कई बड़े बड़े नेता आकर कहते थे लेकिन मैं कभी भी एैसा राष्ट्रपति नहीं बनना चाहुंगा, जो दूसरों के हाथों में खेले, दूसरों पर निर्भर रहे..!!!
हमें न बिकने वाला बनना हैं क्योंकि जो समाज का नेता बिक जाता है, तो न बिकनेवाला समाज अपना नेता तैयार कर लेगा और बिका हुआ नेता का समाज कभी भी अपने सदियों से मिले दु:ख दूर नहीं कर सकता, कभी सम्मान की जिंदगी भी जी नहीं सकता..!! वह दूसरों का पिछलग्गू बना रहेगा, दूसरों के रहमों करम पर निर्भर रहेगा। उन्होंने आगे कहा कि, "जब रूढ़िवादी व्यवस्था पर खतरा मंडराता है तब हमारे समाज में से पीठ्ठु, दलाल, चमचों की बहुत बड़ी मांग रहती हैं। एैसे पीठ्ठु, दलाल, चमचें समाज का उद्धार नहीं देखते वो सिर्फ अपना स्वार्थ देखकर समाज से नफरत करनेवालो को सहयोग करता हैं और एैसे चमचों को सिर्फ और सिर्फ हिलाने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता हैं। समाज से गद्दारी करनेवाले दल (पक्ष) को अगर ये पिठ्ठु, दलाल, चमचें मददगार हो रहे हैं तो एैसे चमचों को फेंककर समाज को बचा लेना चाहिए। वर्ना हम शासक तो दूर की बात हमारा जीवन पशु से भी बदतर हो जायेगा।
ये सोच आज हमारे लिए कितनी उचित हैं ये हम जानते हैं..??
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| सायकल यात्रा से देश भ्रमण करते हुए |
उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक हजारों कि.मी की सायकल यात्रा से देश की गलियों में जाकर ७००० से अधिक सभा एवँ १० करोड़ से ज्यादा समाज के लोगों तक अपनी बात रखकर अपनी सोई हुई कोम को जगानेवाले इस बहुजन नायक मा.काशीरामजी भले ही प्रयाण कर गये पर वर्तमान में राजनैतिक परिदृश्य में हमारे बीच मौजूद हैं।
कांशी तेरी नेक कमाई
तुने सुती कोम जगाई
जग में कर गये एैसा काम
अमर रहे साहब कांशीराम





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