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बहुजन समाज के नायक मा.कांशीराम

              डॉ.बाबासाहब के महापरिनिर्वाण के बाद लंबे समय तक SC, ST एवँ पिछड़ो के अधिकारों को लडनेवाले नेताओं का अकाल पड़ गया था। उस समय डॉ. बाबासाहब के आंदोलन को दफन करने की साजिश की जा रही थी, तब भारत की राजनीति के इतिहास में बहुजन समाज के सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक उत्थान के लिए बाबासाहब के बाद उनके कारवाँ आगे ले जानेवाले दूसरे मसीहा मान्यवर कांशीरामजी ने बहुजन समाज के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया।              डॉ.बाबासाहब के राजनैतिक प्रजातंत्र और राष्ट्र निर्माण के आंदोलन का कोई कांशीराम से बड़ा उत्तराधिकारी हो ही नहीं सकता..!!!  (मा.कांशीरामजी के साथ अहमदाबाद से प्रकाशभाई बैंकर साहब)              हमारे बुजुर्गों के संघर्ष के कारण बदलाव आया है लेकिन बाबासाहब के जाने के बाद बदलाव रुका था। संघर्ष रूका और संघर्ष न होने के कारण बदलाव रूका । अगर हमें उस बदलाव को मंजिल तक पहुँचाना है तो ये बहुत जरूरी है कि हम सामाजिक और आर्थिक गैर बराबरी का अंत करे। डॉ.बाबासाहब ...

आज विश्व महिला दिन पर भारतीय इतिहास के कलंक की झांकी

१९वीं सदी : जिन्हें काटना पड़ा अपना स्तन..!!                 केरल की नंगेली ने स्तन-कर (Brest Tex) के बर्बर कानून के खिलाफ आवाज उठाई थी और अपना जीवन कुर्बान कर दिया था। उसकी उम्र करीब तीस साल की थी। नंगेली खूबसूरत महिला थीं, मगर वह तब सामाजिक व्यवस्था में नीच माने जाने वाले तब के (एड़वा जाति) की थी। उस दौर में महिला दिवस की परंपरा या महिला सशक्तिकरण की आम चलन नहीं थी और नंगेली ने पूरी हिम्मत के साथ आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ी थी। यह घटना वर्ष १८०३ की केरल के तटवर्ती स्थान चेरथला की है। नंगेली के बलिदान के बाद ब्रेस्ट टैक्स का बर्बर कानून हटा लिया गया।                 केरल (त्रावणकोर) में सार्वजनिक तौर पर अपने स्तनों को ढककर रखने की इच्छा रखने वाली महिलाओं से मुलक्करम (स्तन-कर) वसूला जाता था। गरीब महिलाओं को अपने स्तन ढंकने के लिए राजा को कर चुकाना पड़ता था और अपने स्तन को ढंकने के अधिकार को पाने के लिए टैक्स देना होता था। जितने बड़े स्तन होते थे, टैक्स की रकम उतनी ज्यादा होती थी। स्थानीय कर अधिकारी (परव...

राष्ट्र निर्माण में नारी की भूमिका

            जब भारतीय ऋषियों ने अथर्ववेद में ‘माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः’ (अर्थात भूमि मेरी माता है और हम इस धरा के पुत्र हैं।) की प्रतिष्ठा की तभी सम्पूर्ण विश्व में नारी-महिमा का उद्घोष हो गया था। नेपोलियन बोनापार्ट ने नारी की महत्ता को बतातेहुए कहा था कि -‘मुझे एक योग्य माता दे दो, मैं तुमको एक योग्य राष्ट्र दूंगा।’ आदर्श राजमाता जीजाबाई           भारतीय जन-जीवन की मूल धुरी नारी (माता) है। यदि यह कहा जाय कि संस्कृति, परम्परा या धरोहर नारी के कारण ही पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती रही है, तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब-जब समाज में जड़ता आयी है, नारी शक्ति ने ही उसे जगाने के लिए, उससे जूझने के लिए अपनी सन्तति को तैयार करके, आगे बढ़ने का संकल्प दिया है।  कौन भूल सकता है माता जीजाबाई को, जिसकी शिक्षा-दीक्षा ने शिवाजी को महान देशभक्त और कुशल योद्धा बनाया। कौन भूल सकता है पन्ना धाय के बलिदान को पन्नाधाय का उत्कृष्ट त्याग एवं आदर्श इतिहास के स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। वह उच्च कोटि की कर्तव्य परायणता थी। ...

આધુનિક ઇજનેરી કૌશલ્યના પ્રતિક સમો એફિલ ટાવર

ઍફિલ ટાવર, ફ્રાન્સ             આયોજન, રચના અને અસાધારણ કદને કારણે એફિલ ટાવરને જોઈને સૌ કોઈ મુગ્ધ થઈ જાય છે. તેનું વિરાટ કદ ભવ્ય હોવા છતાં નજાકત ભર્યું લાગે છે. ઇ. સ. ૧૮૮૯ ના પ્રસંગે એફિલ ટાવરની રચના કરવામાં આવી.            એ જમાનાનો હતો ઔદ્યોગિક ક્રાંતિનો, પ્રગતિનો. વૈજ્ઞાનિક સિદ્ધિઓના સ્થાપત્ય કલામાં પણ ઘણા પાયાના ફેરફારો થઈ રહ્યા હતા. મકાનોને વધારે હલકા સુંદર દેખાવવામાં અને અદ્યતન બનાવવામાં કાચ, લોખંડ, પોલાદ જેવી સામગ્રીનો ઉપયોગ કરવામાં આવ્યો હતો. ટૂંકમાં સ્થપતિની ભૂમિકા ઇજનેરોએ લેવા માંડી હતી. ઇજનેર ગુસ્તાવ એફિલે કાગળને બદલે આકાશના ફલક ઉપર જાણે ધાતુની સામગ્રીથી અદભુત રેખાઓ દોરી હતી. આ જ ગુસ્તાવ એફીલે અમેરિકાની સ્વાતંત્ર્ય મૂર્તિનું પણ આયોજન કર્યું હતું. તે સમયે ગુસ્તાવ એફિલ જગતભરમાં લોખંડના માળખાનું આયોજન કરનારા ઇજનેરોમાં અગ્રણી ગણાતા હતા. પ્રાચીન સ્થાપત્યો ભૂતકાળના પ્રતીક છે જ્યારે એફિલ ટાવર માનવીની ભવિષ્યની સિદ્ધિઓની આગાહી કરનાર અગ્રદૂત છે.          ૩૨૫ મીટર (૧૦૬૬ ફૂટ) ઊંચો એફિલ ટાવર ...
देखो ये रंग छूट ही नहीं रहा, कहा था पानी मिलाना, प्यार मिला दिया ना....!!!!
ઓ હૃદય તે પણ ભલા,કેવો ફસાવ્યો છે મને, જે ન થયા મારા તે એનો બનાવ્યો છે મને..!! "બેફામ"
एक सिगारेट सी मिली, तू हमें ए...आशिकी              कश एक पल का लगाया था              लत उम्रभर की लग गई...!!